Sunderkand – 16
अस कहि करत दंडवत देखा।
तुरत उठे प्रभु हरष बिसेषा॥
दीन बचन सुनि प्रभु मन भावा।
भुज बिसाल गहि हृदयँ लगावा॥
ऐसे कहते हुए बिभीषणको दंडवत करते देखकर प्रभु बड़े अल्हादके साथ तुरंत उठ खड़े हए॥
अस कहि करत दंडवत देखा।
तुरत उठे प्रभु हरष बिसेषा॥
दीन बचन सुनि प्रभु मन भावा।
भुज बिसाल गहि हृदयँ लगावा॥
ऐसे कहते हुए बिभीषणको दंडवत करते देखकर प्रभु बड़े अल्हादके साथ तुरंत उठ खड़े हए॥
सुनु लंकेस सकल गुन तोरें।
तातें तुम्ह अतिसय प्रिय मोरें॥
राम बचन सुनि बानर जूथा।
सकल कहहिं जय कृपा बरूथा॥
हे लंकेश (लंकापति)! सुनो, आपमें सब गुण है और इसीसे आप मुझको अतिशय प्यारें लगते हो॥
प्रगट बखानहिं राम सुभाऊ।
अति सप्रेम गा बिसरि दुराऊ॥
रिपु के दूत कपिन्ह तब जाने।
सकल बाँधि कपीस पहिं आने॥
और देखते देखते प्रेम ऐसा बढ़ गया कि वह (रावणदूत शुक) छिपाना भूल कर रामचन्द्रजीके स्वभावकी प्रकटमें प्रशंसा करने लगा॥
Bhulo Mat Pyare Bihari Ji ka Naam
Bankey Bihari Mujhko Dena Sahara
Jaldi Jaldi Vrindavan Aate Rahna
Agar Shyam Sunder ka sahara na hota
ए कपि सब सुग्रीव समाना।
इन्ह सम कोटिन्ह गनइ को नाना॥
राम कृपाँ अतुलित बल तिन्हहीं।
तृन समान त्रैलोकहि गनहीं॥
ये सब वानर सुग्रीवके समान बलवान हैं। इनके बराबर दूसरे करोड़ों वानर हैं, कौन गिन सकता है? ॥
लछिमन बान सरासन आनू।
सोषौं बारिधि बिसिख कृसानु॥
सठ सन बिनय कुटिल सन प्रीति।
सहज कृपन सन सुंदर नीति॥
हे लक्ष्मण! धनुष बाण लाओ। क्योंकि अब इस समुद्रको बाणकी आगसे सुखाना होगा॥
हनुमानजी का सीता शोध के लिए लंका प्रस्थान
सिताजीने हनुमानको आशीर्वाद दिया
हनुमानजी ने श्रीराम को सीताजी का सन्देश दिया
भगवान् श्री राम की महिमा
समुद्र की श्री राम से विनती
बड़ा नटखट है रे कृष्ण कन्हैया
का करे यशोदा मैया
ढूंढे री अखियाँ उसे चहुँ ओर,
जाने कहाँ छुप गया नंदकिशोर।
उड़ गया ऐसे, जैसे पुरवईया,
का करे यशोदा मैया॥
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बड़ा नटखट है रे कृष्ण कन्हैया
का करे यशोदा मैया
ढूंढे री अखियाँ उसे चहुँ ओर,
जाने कहाँ छुप गया नंदकिशोर।
उड़ गया ऐसे, जैसे पुरवईया,
का करे यशोदा मैया॥
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