Sunderkand – Chaupai – 02

सुनहु पवनसुत रहनि हमारी।
जिमि दसनन्हि महुँ जीभ बिचारी॥
तात कबहुँ मोहि जानि अनाथा।
करिहहिं कृपा भानुकुल नाथा॥

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Leke Puja Ki Thali, Jyot Man Me Jagali

ले के पूजा की थाली, ज्योत मन की जगाली,
तेरी आरती उतारूँ, भोली माँ।
सफल हुआ यह जनम,
के मैं था जन्मो से कंगाल।
तुने भक्ति का धन देके,
कर दिया मालामाल।

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